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बुधवार, 31 अगस्त 2011

याज्ञवल्क्य और मैत्रियी की कथा

याज्ञवल्क्य और मैत्रियी की कथा 

महर्षि याज्ञवल्क्य वैदिक युग में एक अत्यन्त विद्वान व्यक्ति हुए हैं। वे ब्रह्मज्ञानी थे। उनकी दो पत्नियां थीं। एक का नाम कात्यायनी तथा दूसरी का मैत्रियी था । कात्यायनी सामान्य स्त्रियों के समान थीं, वह घर गृहस्थी में ही व्यस्त रहती थी। सांसारिक भोगों में उसकी अधिक रूचि थी। सुस्वादी भोजन, सुन्दर वस्त्र और विभिन्न प्रकार के आभूषणो में ही वह खोई रहती थी। याज्ञवल्क्य जैसे प्रसिद्ध महर्षि की पत्नी होते हुए भी उसका धर्म में उसे कोई आकर्षण नहीं दिखाई देता था। वह पूरी तरह अपने संसार में मोहित थी। जबकि मैत्रियी अपने पति के साथ प्रत्येक धार्मिक कार्य में लगी रहती थी। उनके प्रत्येक कर्मकाण्ड में सहायता देना तथा प्रत्येक आवश्यक वस्तु उपलब्ध कराने मे उसे आनन्द आता था। अध्यात्म में उसकी गहरी रूचि थी तथा अपने पति के साथ अधिक समय बिताने के कारण आध्यात्मिक जगत में उसकी गहरी पैठ थी। वह प्रायः महर्षि याज्ञवल्क्य के उपदेशों को सुनती, उनके धार्मिक क्रिया-कलापों में सहयोग देती तथा स्वंय भी चिन्तन-मनन में लगी रहती थी। सत्य को जानने की उसमें तीव्र जिज्ञासा थी।
एक बार महर्षि याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ त्यागकर संन्यास लेने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को अपने समीप बुलाया और उनसे बोले, 'हे मेरी प्रिय धर्मपत्नियों, मैं गृहस्थ त्यागकर संन्यास ले रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे पश्चात तुम दोनों में किसी प्रकार का विवाद न हो। इसलिए मेरी जो भी धन-सम्पत्ति है तथा घर में जो भी सामान है, उसे तुम दोनों में आधा-आधा बांट देना चाहता हूं।' कात्यायनी तुंरत तैयार हो गई लेकिन मैत्रियी सोचने लगी कि ऐसी क्या वस्तु है जो गृहस्थ से भी अधिक सुख, सतोंष देने वाली है और जिसे प्राप्त करने के लिए महर्षि गृहस्थ का त्याग कर रहे हैं। वह बोली, 'भगवन आप जिस स्थिति को प्राप्त करने के लिए गृहस्थ का त्याग कर रहे हैं, क्या वह इस गृहस्थ जीवन से अधिक मूल्यवान है?' महर्षि ने उत्तर दिया, 'मैत्रियी वह अमृत है, यह संसार नाशवान है। इसका सुख क्षणिक है, वह स्थायी आनन्द है। उसी की खोज में मैं अपना शेष जीवन व्यतीत कर देना चाहता हूं।' मैत्रियी फिर बोली, 'भगवन यदि धन-धान्य से पूर्ण यह समस्त पृथ्वी मुझे मिल जाए तो क्या मृत्यु मेरा पीछा छोड़ देगी, मैं अमर हो जाऊंगी।' महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा, 'प्रिय मैत्रियी, धन से तो सांसारिक वस्तुओं का ही प्रबंध किया जा सकता है। यह तो शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति, भोग-विलास तथा वैभव का ही साधन है। इससे अमरत्व का कोई सम्बंध नहीं है।' तब मैत्रियी ने कहा, 'यदि ऐसा है तो आप मुझे इससे क्यों बहला रहे हैं। मुझें इसकी आवश्यकता नहीं है। मुझे तो आप उस तत्व का उपदेश दीजिए जिसमें मैं सदा रहने वाला सुख पा सकूं। उसे जान सकूं जिसे जानने के पश्चात कुछ भी जानना शेष नहीं रहता तथा इस आवागमन के चक्र से मुफ्त होकर सदा-सदा के लिए अमर हो जाऊं।'
महर्षि अपनी पत्नी की सत्य के प्रति जिज्ञासा को जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी पत्नी की प्रशंसा करते हुए कहा, 'हे मैत्रियी, तुम्हारी इस सच्ची लगन को देखकर मैं पहले भी तुमसे प्रसन्न था और तुम्हें प्यार करता था, अब तुम्हारी बातें सुनकर मैं तुमसे बहुत अधिक प्रसन्न हूं, आओ, मेरे पास बैठो, मैं तुम्हें वह ज्ञान दूंगा जिससे वास्तव में तुम्हारी आत्मा का कल्याण होगा और तुम संसार के माया-मोह से सदा के लिए मुफ्त हो जाओगी।' और ऐसा ही हुआ, मैत्रियी ने अपने पति के द्वारा ज्ञान प्राप्त करके, ईश्वर को पा लिया और उसका मन स्थायी शांति तथा आनन्द से परिपूर्ण हो गया।
ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्मेति उस कल्याणकारी परमात्मा को जानकर ही भक्त अत्यन्त शान्ति (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

ईद पर नमाज़


ईद पर नमाज़
    * ईद-उल-फ़ितर मुसलमानों का पवित्र त्योहार है।
    * रमज़ान के पूरे महीने में मुसलमान रोज़े रखकर अर्थात भूखे-प्यासे रहकर पूरा महीना अल्लाह की इबादत में गुज़ार देते हैं। इस पूरे महीने को अल्लाह की इबादत में गुज़ार कर जब वे रोज़ों से फ़ारिग हो जाते हैं तो चांद की पहली तारीख़ अर्थात जिस दिन चांद दिखाई देता है, उस रोज़ को छोड़कर दूसरे दिन ईद का त्योहार अर्थात ‘बहुत ख़ुशी का दिन’ मनाया जाता है। इस ख़ुशी के दिन को ईद-उल-फ़ितर कहते हैं।
    * ईद का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मुसलमान किसी पाक साफ़ जगह पर जिसे 'ईदगाह' कहते हैं, वहां इकट्ठे होकर दो रक्आत नमाज़ शुक्राने की अदा करते हैं। 'ए अल्लाह, आपका शुक्रिया कि आपने हमारी इबादत कबूल की।' इसके शुक्राने में हम दो रक्आत ईद की नमाज पढ़ रहे हैं। आप इसे क़बूल भी करें। ईद की नमाज़ का हुक्म भी अल्लाह तआला की तरफ से है।
    * ईदगाह में नमाज़ पढ़ने के लिए जाने से मुसलमान लोग 'फ़ितरा' अर्थात 'जान व माल का सदक़ा' जो हर मुसलमान पर फ़र्ज होता है, वह ग़रीबों में बांटा जाता है। सदक़ा अल्लाह ने ग़रीबों की इमदाद का एक तरीक़ा सिखा दिया है। ग़रीब आदमी भी इस इमदाद से साफ़ और नये कपड़े पहनकर और अपना मनपसन्द खाना खाकर अपनी ईद मना सकते हैं। अमीर-ग़रीब एक साथ मिलकर नमाज़ पढ़ सकते हैं।

रोज़ा क्या है?

क़ुरान शरीफ़ के शब्दों में 'ए ईमान वालो, हमने तुम पर रोज़े पाक कर दिये हैं, जैसा कि तुमने पिछली उम्मतों (अनुयायियों) पर फ़र्ज किए थे ताकि तुम मुत्तफ़िक़ अर्थात फ़रमाबरदार बन जाओ। यह गिनती के चन्द दिन हैं अगर तुम में से कोई मरीज़ है या सफ़र में है, तो उस वक़्त रोज़े छोड़कर ईद के बाद में अपने रोज़े पूरे कर सकता है। रमज़ान के पूरे महीने में मुसलमान भूखे-प्यासे रहकर और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं। वह शबे-क़द्र की रात को सारी रात जाग कर अल्लाह की इबादत करते हैं।

रमज़ान क्या है?

रमज़ान महीने का नाम है, जिस प्रकार हिन्दी महीने चैत, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, सावन, भाद्र पद, आश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ, फाल्गुन होते हैं और अंग्रेज़ी महीने जनवरी, फ़रवरी, मार्च, अप्रेल, मई, जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर होते हैं । उसी प्रकार, मुस्लिम महीने, मोहर्रम, सफ़र, रबीउल अव्वल, रबीउलसानी, जुमादलऊला, जुमादल उख़्र, रजब, शाबान, रमज़ान, शव्वाल, द्हू अल-क़िदाह, द्हू अल-हिज्जाह ये बारह महीने आते हैं।

रमज़ान के महीने में अल्लाह की तरफ़ से हज़रत मोहम्मद साहब सल्लहो अलहै व सल्लम पर क़ुरान शरीफ़ नाज़िल (उतरा) था। इस महीने की बरकत में अल्लाह ने बताया कि इसमें मेरे बंदे मेरी इबादत करें। इस महीने के आख़री दस दिनों में एक रात ऐसी है जिसे शबे-क़द्र कहते हैं। 21, 23, 25, 27, 29 वें में शबे-क़द्र को तलाश करते हैं। यह रात हज़ार महीने की इबादत करने से भी अधिक बेहतर होती है। शबे-क़द्र का अर्थ है, वह रात जिसकी क़द्र की जाए। यह रात जाग कर अल्लाह की इबादत में गुज़ार दी जाती है।

गणेश उपासना

गणेश उपासना
सर्वप्रथम पूजे जाने वाले मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश के पूजन अर्चन से ही सभी प्रकार की गतिविधियों की शुरूआत आदिकाल से होती रही है। किसी भी प्रकार की साधना हो, गणेशजी का स्मरण करने के बाद ही इनकी सारी प्रत्रि*या आरंभ होती है।
साधना के जरिये ईश्वर की कृपा प्राप्ति और साक्षात्कार के मुमुक्षुओं के लिए गणेश उपासना नितान्त अनिवार्य है। इसके बगैर न तो जीवन में और न ही साधना में कोई सफल हो सकता है।
श्री गुरु चरणों की अनुकंपा प्राप्त कर साधना पथ की ओर अग्रसर होने वाले साधकों के लिए महागणपति की साधना नितान्त आवश्यक है क्योंकि जिस मार्ग पर चल कर हमें अपने लक्ष्य तक पहुंचना है उसमें आने वाले विघ्नों, अपसारण तथा कण्टाकीर्ण पथ को कुसुम कोमल बनाने के लिए भगवान गणपति का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त कर लेना साधक का सर्वप्रथम कर्त्तव्य बन जाता है।
गणपति केवल विघ्न दूर करने वाले देव ही नहीं हैं वरन् ऋद्धि सिद्धि के दाता, विद्याप्रदाता, मांगलिक कार्यों के पूरक, संग्राम संकट के निवारक तथा सर्व विध मंगलकारी हैं। यौगिक साधना की पूर्ति में भी महागणपति की कृपा प्राप्ति अत्यावश्यक है।
गणेश उपासना पुरातन काल से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण रही है और इसीलिये सभी प्रकार की उपासना पद्धतियों में गणेशजी पर विस्तार से जानकारी का समावेश है। गणेश उपासना के अनेक प्रकार हैं। स्वतंर्त देव के अतिरिक्त इन्हें षट्कुमार, पंच बालक, सप्तबालक आदि गणों में भी स मलित माना गया है।
गणपति की साधना के अनेक प्रकार हैं। पार्थिव गणेश प्रयोग 42 दिन तक किया जाता है। गणपति तर्पण प्रयोग भी अपने आप में अनेक कामनाओं की पूर्ति करने वाला है।
गणेश उपासना के अन्य प्रयोगों में एकाक्षर गणेश, हरिद्रा गणेश, विरिन्चि विघ्नेश, शक्ति गणेश, चतुरक्षर सिद्धि गणेश, लक्ष्मी गणेश, क्षिप्रप्रसादन गणेश, हेर ब गणेश, सुब्रह््मण्यम गणेश, वऋतुण्ड गणेश, उच्छिष्ट गणेश आदि के प्रयोग अति महत्त्वपूर्ण हैं।
इन मंर्तों के जाप, हवन और तर्पण के प्रयोगों के माध्यम से षट् कर्म सिद्धि, तिलक सिद्धि, अणिमादि अष्ट सिद्धि एवं स्वर्ण, यश, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति के उपाय भी बताये गए हैं। इन्हीं में चूर्ण साधन, धूप साधन, यंर्त धारण एवं निर्माण आदि विद्याएं भी स मलित हैं। पृथक पृथक कार्य साधन के लिए गणेश जी की विविध पदार्थों की मूर्तियों के निर्माण का विधान है।
पौराणिक उक्ति ’’कलौ चण्डी विनायकौ’’ के अनुसार कलियुग में गणेश साधना का खास महत्त्व है। कलियुग में गणेशजी एवं चण्डी की साधना तत्काल कार्य सिद्ध करने वाली है।
गणपति की साधना गुरु या विद्वान ब्राह्मण से पूर्ण समझकर करने से सभी कार्यों की शीघ्र सिद्धि होती है। इसी प्रकार साधक को साधना काल में भी किसी भी प्रकार के आकस्मिक विघ्नों के उपस्थित हो जाने पर भगवान गणपति की मामूली साधना और स्मरण कर लिया जाना चाहिए।
गणेशजी की कृपा प्राप्ति के लिए इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वह गणेशजी के किसी भी छोटे से मंत्र या स्तोत्र का अधिक से अधिक जप करे तथा मूलाधार चऋ में गणेशजी के विराजमान होने का स्मरण हमेशा बनाए रखे। इससे कुछ ही दिन में गणेशजी की कृपा का स्वतः अनुभव होने लगेगा।

वास्तु शास्त्र का आखिर सच ..................... ?

jyotish ka surya
वास्तु शास्त्र का आखिर सच क्या है ?
प्राचीन वास्तु शास्त्र का शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक आधार कम होते जा रहा है
फैशन बन गया है वास्तुशास्त्र और बढ़ता जा रहा है  अन्ध विश्वास की ओर.
वैदिक काल से ही ज्योतिष शास्त्र अति पुरातन परम्परा मे मानव जीवन के विविध पक्षों पर अति सूक्ष्मता से विचार करता आ रहा है. जिस क्रम से मानव सभ्यता का विकास हुआ उसी क्रम से  विविध रूपो मं इस चमत्कारी विद्या का भी विकास हुआ. जीवन मं आने वाली प्राकृतिक - अप्राकृतिक विनाशकारी आपदाओं, घटने वाली घटनाओं और होने वाली बीमारियों को जानने, बाधारहित घर का निर्माण तथा भूमिगत पदार्थो के आधार पर भूमि का शुभ और अशुभ फलों के ज्ञान सहित भूमि का गृहनिर्माण में कितनी उपयोगिता आदि के बारे में ज्योतिष संहिता के भाग में चार पुरुषार्थो के साधन का महत्वपूर्ण अंग है जिसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति का अपना घर होना चाहिये. क्योंकि इसके बिना व्यक्ति के मौत और स्मार्त कर्म पूर्ण फल नही देते. यदि उक्त कर्म किसी दूसरे की भूमि या घर में करते हैं तो उसके पूण्य फल का भागीदार भूमि स्वामी या गृहपति बन जाता है. जैसा कि भविष्यपुराण में उल्लेखित किया गया है।
गृहस्थस्य क्रिया: सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं बिना।
यतस्तस्माद, गृहारम्भ प्रवेश समयौ ब्रुवे॥
परगेहे कृता: सर्वे श्रौतस्मार्ट क्रिया: शुभा:।
न सिद्धयन्ति यतस्मार्त भुमीश: फलमुरश्नुते॥
उपरोक्त पैराणिक कथन से दान में सर्वाधिक महापुण्य कन्यादान होता है. और आज कल के बदलते परिवेश में विवाह करने व कराने का अधिकतम कार्य होटल, रेस्टोरेंट, लॉज, सामुहिक भवन सहित आस पास के मैदान में टेन्ट के छांïव तले ही सम्पन्न होते हैं. इस प्रकार यदि प्रमाणितका के तरफ जाते हैं तो होटल, रेस्टोरेन्ट या सार्वजनिक स्थलों पर केवल रिसेप्शन ही सम्भव है. यहां आपको बताना आवश्यक होगा कि समाजिक विसंगति अथवा बाहरी दिखावा रूपी फैशन इतना हावी हो चुका है कि वास्तु को नियमों व शर्तो को ताक पर रखते हुये इसे अन्ध विश्वास कायम कर अपने आपको एक माडर्न मानव सभ्यता का परिचय देते हैं. परिणाम आप लोगों के सामने है. दिन प्रतिदिन पति-पत्नी में बढ़ती दूरियां पति द्वारा पत्नि को मार देना अथवा पत्नि के अवैध सम्बन्धों के अन्धेरी रात में अपने पति का ही कत्ल करा देना आदि घृणीत कार्यो में पिछले उदशक में भारी वृद्धि हुयी है.
वस्तुत: पौराणिक व शास्त्रीय धर्म सूत्र एक दूसरे से आत्म मिलन कराता है. तथा फैशन रूपी माडर्न सभ्यता के फिल्मी स्टाईल सूत्र क्षण मात्र के लिये ऊपरी मन से मिलन होता है. क्योंकि होटलों में विवाह की वेदी पर बैठे वर-वधू छोटी उम्र से ही फिल्मी अंदाज फिल्माया गये करतब देखे हैं. और उसी चित्र पट को माता पिता बखूबी परोसने में वास्तु एवं पुराणों के धर्म सूत्र को नजर अंदाज कर देते हैं. और परिणाम की बिटिया के विवाहोपरान्त चन्द दिनों में अपने माता पिता के शरण में आ जाती है. अथवा सलाखों के पीछे होती है. या तिसरा घृणित कार्य मानी स्वयं प्रभु के प्यारे हो जाती है. खैर बाते बहुत है किन्तु मै आपको सार गर्भित शब्दों में यहाँ ज्योतिष का सूर्य के माध्यम से बताना  चाहूँगा कि भारतीय संस्कृति की धुरी शास्त्रीय धर्मसूत्र जीवन को सुधार का बेहतर बनाता है. फैशन पर आधारित सभी कृत्य चाहे वह बनावटी धर्म कृत्य अथवा आधुनिक बनावटी वास्तु शास्त्रीयों के कपोल कल्पित वास्तु के सिद्धान्त यह केवल अन्ध विश्वास के तरफ धकेलने का एक सुनियोजित स्वार्थ पारायणता है जिससे समाज का भला कम लेकिन कपोलकल्पित वास्तु शास्त्रीयों का एक मोटी रकम के रूप में बेहतर भला जरूर होता है. जरूरत है हमें सम्भलने का....

वास्तु शास्त्र का आखिर सच क्या है ?

jyotish ka surya
वास्तु शास्त्र का आखिर सच क्या है ?
प्राचीन वास्तु शास्त्र का शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक आधार कम होते जा रहा है
फैशन बन गया है वास्तुशास्त्र और बढ़ता जा रहा है  अन्ध विश्वास की ओर.
वैदिक काल से ही ज्योतिष शास्त्र अति पुरातन परम्परा मे मानव जीवन के विविध पक्षों पर अति सूक्ष्मता से विचार करता आ रहा है. जिस क्रम से मानव सभ्यता का विकास हुआ उसी क्रम से  विविध रूपो मं इस चमत्कारी विद्या का भी विकास हुआ. जीवन मं आने वाली प्राकृतिक - अप्राकृतिक विनाशकारी आपदाओं, घटने वाली घटनाओं और होने वाली बीमारियों को जानने, बाधारहित घर का निर्माण तथा भूमिगत पदार्थो के आधार पर भूमि का शुभ और अशुभ फलों के ज्ञान सहित भूमि का गृहनिर्माण में कितनी उपयोगिता आदि के बारे में ज्योतिष संहिता के भाग में चार पुरुषार्थो के साधन का महत्वपूर्ण अंग है जिसके अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति का अपना घर होना चाहिये. क्योंकि इसके बिना व्यक्ति के मौत और स्मार्त कर्म पूर्ण फल नही देते. यदि उक्त कर्म किसी दूसरे की भूमि या घर में करते हैं तो उसके पूण्य फल का भागीदार भूमि स्वामी या गृहपति बन जाता है. जैसा कि भविष्यपुराण में उल्लेखित किया गया है।
गृहस्थस्य क्रिया: सर्वा न सिद्धयन्ति गृहं बिना।
यतस्तस्माद, गृहारम्भ प्रवेश समयौ ब्रुवे॥
परगेहे कृता: सर्वे श्रौतस्मार्ट क्रिया: शुभा:।
न सिद्धयन्ति यतस्मार्त भुमीश: फलमुरश्नुते॥
उपरोक्त पैराणिक कथन से दान में सर्वाधिक महापुण्य कन्यादान होता है. और आज कल के बदलते परिवेश में विवाह करने व कराने का अधिकतम कार्य होटल, रेस्टोरेंट, लॉज, सामुहिक भवन सहित आस पास के मैदान में टेन्ट के छांïव तले ही सम्पन्न होते हैं. इस प्रकार यदि प्रमाणितका के तरफ जाते हैं तो होटल, रेस्टोरेन्ट या सार्वजनिक स्थलों पर केवल रिसेप्शन ही सम्भव है. यहां आपको बताना आवश्यक होगा कि समाजिक विसंगति अथवा बाहरी दिखावा रूपी फैशन इतना हावी हो चुका है कि वास्तु को नियमों व शर्तो को ताक पर रखते हुये इसे अन्ध विश्वास कायम कर अपने आपको एक माडर्न मानव सभ्यता का परिचय देते हैं. परिणाम आप लोगों के सामने है. दिन प्रतिदिन पति-पत्नी में बढ़ती दूरियां पति द्वारा पत्नि को मार देना अथवा पत्नि के अवैध सम्बन्धों के अन्धेरी रात में अपने पति का ही कत्ल करा देना आदि घृणीत कार्यो में पिछले उदशक में भारी वृद्धि हुयी है.
वस्तुत: पौराणिक व शास्त्रीय धर्म सूत्र एक दूसरे से आत्म मिलन कराता है. तथा फैशन रूपी माडर्न सभ्यता के फिल्मी स्टाईल सूत्र क्षण मात्र के लिये ऊपरी मन से मिलन होता है. क्योंकि होटलों में विवाह की वेदी पर बैठे वर-वधू छोटी उम्र से ही फिल्मी अंदाज फिल्माया गये करतब देखे हैं. और उसी चित्र पट को माता पिता बखूबी परोसने में वास्तु एवं पुराणों के धर्म सूत्र को नजर अंदाज कर देते हैं. और परिणाम की बिटिया के विवाहोपरान्त चन्द दिनों में अपने माता पिता के शरण में आ जाती है. अथवा सलाखों के पीछे होती है. या तिसरा घृणित कार्य मानी स्वयं प्रभु के प्यारे हो जाती है. खैर बाते बहुत है किन्तु मै आपको सार गर्भित शब्दों में यहाँ ज्योतिष का सूर्य के माध्यम से बताना  चाहूँगा कि भारतीय संस्कृति की धुरी शास्त्रीय धर्मसूत्र जीवन को सुधार का बेहतर बनाता है. फैशन पर आधारित सभी कृत्य चाहे वह बनावटी धर्म कृत्य अथवा आधुनिक बनावटी वास्तु शास्त्रीयों के कपोल कल्पित वास्तु के सिद्धान्त यह केवल अन्ध विश्वास के तरफ धकेलने का एक सुनियोजित स्वार्थ पारायणता है जिससे समाज का भला कम लेकिन कपोलकल्पित वास्तु शास्त्रीयों का एक मोटी रकम के रूप में बेहतर भला जरूर होता है. जरूरत है हमें सम्भलने का....

मूँगा गणेश

विघ्रहर्ता मूँगा गणेश प्रयोग
यदि  आपके कार्यो में रूकावटें आती हो, कार्य होते-होते रूक जाता हो, तो आपको विघ्रहर्ता मूँगा के गणेश की साधना करनी चाहिए. इस साधना के लिए इस वर्ष की अक्षय तृतीया विशेष फलदायी है. गौरी विनायकोपेता मे कहा गया है कि यदि अक्षय तृतीया के दिन चतुर्थी भी आ जाए, तो यह योग शीघ्र एवं अधिक शुभ फलदायी होता है.
अभिजीत मुहूर्त में विघ्रहर्ता मूँगा गणेश की घर के पूजा कक्ष में स्थापना करें तथा उनकी विधिपूर्वक पूजा करें. पूजा के उपरान्त निम्रलिखित स्तोत्र का ग्यारह बार पाठ करें.
परं धाम परं ब्रम्ह परेशं परमेश्वरम।
विघ्र-निघ्र करं शान्तं पुष्टं कान्तं-अनंतकम॥
सुरासुरइन्द्रै: सिद्ध-इन्द्रै: स्तुतं स्तौमि परात्परम॥
सुर पद्म दिनेशं च गणेशं मंगलायनम।
इदं स्तोत्रं महापुण्यं विघ्र-शोक हरं परम्।
य: पठेत् प्रात:-उत्थाय सर्व विघ्नात् प्रमुच्यते॥
प्रत्येक दिन मूँगा गणेशजी की धूप-दीप से पूजा करने के उपरान्त विघ्रहर्ता गणेश स्तोत्र का पाठ करें. आप स्वयं ही अनुभव करेंगे कि कार्यो में आने वाली बाधाएँ समय के साथ-साथ दूर होती जा रही है. चारों ओर आपको सफलता मिल रही है।

जय श्री गणेश : मूलांक 8 और आपका भविष्य

जय श्री गणेश : मूलांक 8 और आपका भविष्य
जिन व्यक्तियों का जन्म दिनांक 8,17 और 26 होता है. उनका मूलांक 8 होता है. इस मूलांक का स्वामी ग्रह शनि होता है. यह अत्यंत प्रबल नियंत्रक अंक है। कीरो ने अंक 8 के बारे मे ंलिखा है कि अंक 8 का वर्णन करना कठिन है.यह दो विश्वो भौतिक और आध्यात्मिक का प्रतिनिधित्व करता है. यह दो वृत्तों जैसा है जो कि एक दूसरे को स्पर्श कर रहे हैं. यह दो समान अंकों 4 और 4 से मिलकर बना है.इस अंक की प्रकृति एक तरफ तो उथल-पुथल, क्रांति, अराजकता, हठ और झक्कीपन का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं दूसरी ओर दार्शनिक विचार, निगूढ़ अध्ययनों के प्रति गंभीर झुकाव, धार्मिक समर्पण, उद्देश्य के प्रति एकाग्रता, जोश के साथ किसी कार्य के लिए जुट जाना और सभी क्रियाओं के प्रति भाग्यवादी दृष्टिïकोण का प्रतिनिधित्व करती है. डॉ. रॉबिंसन ने अंक 8 को प्रभावशील नेतृत्व एïवं व्यक्तित्व का कारक माना है. यही मत मार्गोरेट अर्नोल्ड का है. वे आगे लिखते हैं कि ह प्रबंध और कार्यकारी सामथ्र्य को प्रतिबिंबित करता है.
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है. ये बड़े गंभीर होते हैं. विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न होते हुए अपने कार्यो मे ंसंलग्र रहते हैं. आत्मप्रशंसा से दूर रहते हैं.ये अन्तमुर्खी होते हैं और सदैव अपने कार्यो में व्यस्त रहते हैं. इनकी बातों में बजन होता है. तथा इनके द्वारा कही गई बातें प्रामाणिक मानी जाती है. लोगों में इनके वचन का मूल्य होता है.
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों में नेतृत्व क्षमता अच्छी होती है. ये दूसरों से काम कराना जानते हैं. किन्तु ये शक्ति एवं सत्ता के साथ काम कराते हैं.
मूलांक 8 वाले व्यक्ति कर्मठ होते हैं.ये कर्म को ही पूजा मानते हैं ये समय का मूल्य पहचानते हैं. और समय को व्यर्थ ही जाने नहीं देते. ये सदैव अपने कायर्ई में संलग्र रहते हैं. हँसी मजाक, गीत संगीत में इनकी रूचि कम होती है. ये एकान्त में रहना अधिक पसन्त करते हैं, इनका रहन सहन सरल रहता है. किन्तु इनके विचार उच्च होते हें. ये दिखावा पसन्द नहीं होते. शानो-शौकत से रहना इन्हें भाता नहीं है।
मूलांक 8 वाले व्यक्ति महत्वाकांक्षी होते हैं.
इनकी विचारधारा बड़ी उच्च होती है. ये प्रत्येक कार्य उच्चस्तर से करना चाहते हैं. य यदि नौकरी करते हैं तो उच्च पदाभिलाषी होते हैं. और यदि ये व्यापारी होते हैं तो व्यापार उच्च स्तर से करना चाहते हैं.
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों की विचारधारा आध्यात्मिक के स्थान पर भौतिक होती है.ये जीवन को भौतिक दृष्टिï से देखते हैं. धर्म-अध्यात्म इत्यादि में इनकी अधिक रूचि नही होती है. ये धर्म को तार्किक दृष्टिï से देखना चाहते हैं. श्रद्धा का भाव इनमें कम होता है. यही कारण है कि ये मूर्ति पूजा में कम विश्वास करते हैं।
मूलांक 8 वाले व्यक्ति यद्यपि कर्मठ होते हैं. किन्तु ये कार्य मुख्य रूप से पैसा प्राप्त करने के लिये करते हैं. ये केवल वही र्का करते हैं जिसमें इन्हे पैसे की प्राप्ति होती है. इनका मुख्य  उद्देश्य धन कमाना होता है.
मूलांक 8 वाले व्यक्ति सनकी जैसे होते हैं. ये किसी भी कार्य को आरंभ  करते हैं, तो उसको पूरा करके ही दम लेते हैं. कार्य के पीछे ये भूत की तरह पड़ जाते हैं. यदि इनक ऊपर कोई उत्तरदायित्व को भली भांति पूरा करते हैं. ये उसे पूरा करने के लिए सोना , विश्राम करना, खाना पीना, इत्यादि सब कुछ छोड़ देते हैं. ये मित्रों, परिचितों एवं रिश्तेदारों से भी नही मिलते. अपनी इस आदत के कारण परिवार में तनाव रहता है.
मूलांक 8 वाले व्यक्ति मदिरापन , जुए और सट्टेबाजी की ओर शीघ्र ही उन्मुख हो जाते हैं. इनके संबंध में कुअवसर मिलते ही ये स्वयं को रोक नहीं पाते है।
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों के जीवन में आकस्मिकता का प्रभाव अधिक मिलता है. मूलांक 4 की भांति इनके जीवन में घटने वाली अधिकतर अच्छी बुरी घटनाएं आकस्मिक ढंग़ से ही होती है. इनके आय और व्यय भी आकस्मिक ढंग से होते हैं. अत: ये लॉटरी, शेयर आदि व्यवसायों में भी लाभ उठाते हैं.
मूलांक 8 वाले व्यक्ति यद्यपि भाग्यशाली होते हैं. किन्तु इनका भाग्य  शनि प्रधान व्यवसायों में ही चमकता है. यही कारण है कि मूलांक 8 वाले कई व्यक्ति तो बहुत धनी और जीवन में अत्यन्त सफल होते हैं. वहीं दूसरी ओर मूलांक 8 वाले कई व्यक्ति विपन्नावस्था में भी मिल जाएंगे।
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों के मित्र कम होते हैं. लेकिन अधिकतर मित्र विश्वासी होते हैं. इनके शत्रु भी होते है.ं मूलांक 8 वाले व्यक्ति मित्रों के लिए बहुत सहायक होते हैं. ये उनकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. दूसरी ओर शत्रुओं के लिए े बड़े ही निर्दयी होते हैं. शत्रुओं को नेस्तनाबूत करने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं.
मूलांक 8 वाले व्यक्ति सत्ता का दुरुपयोग करने वाले होते हैं. कई बारये व्यसनी,आलसी, नास्तिक, निर्दयी, निराश, चिंतित, रूखे, असहिष्णु, बदाम, कठोर नियंत्रण लगाने वाले इत्यादि होते हैं.
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों के प्रेम संबंधों में प्राय: स्थायित्व का अभाव पाया जाता है. ये अपनी ओर से प्रेम के स्थायित्व के संबंध मेें उत्सुक नही होते हैं. इनकी प्रवृत्थि इसके प्रति उदासीन रहने की है ये प्रेम की अभिव्यक्ति शांतिपूर्ण तरीकों से करते हैं. और प्रेमी के पसन्दानुसार तकनीकों को अपना लेते हैं.
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों को 8 मूलांक वाले व्यक्तियों के साथ विवाह करना चाहिए. इनका विवाह विवाहोपयुक्त आयु से कुछ अधिक आयु में होता है. विवाह में प्राय: माता पिता की सहमति होती है. मूलांक 8 वाले व्यक्तियों के प्रेम विवाहकम ही होते हैं. इनका जीवनसाथी गुणवान एïवं समर्पित भाव रखने वाला होता है.
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों का दाम्पत्य जीवन औसत होता है. छोटी-छोटी बातों से दाम्पत्य जीवन में तनाव और कटुता आती है. मूलांक 8 वाले व्यक्ति की शीघ्र ही क्रोधित हो जाने की प्रवृत्ति तथा विवाहोपरान्त प्रेम-प्रसंगो के कारण दाम्पत्य जीवन में कटुता और तनाव आते हैं. आपसी समझ से ये कटुता और तनाव शीघ्र ही दूर हो जाते हैं. मूलांक 8 वाले व्यक्तियों के जीवन साथी का स्वास्थ्य प्राय: कमजोर रहता है.
जिन व्यक्तियों का मूलांक 8 है, उन्हें ऐसे व्यक्तियों से साझेदारी करनी चाहिए जिनका मूलांक 8 है अर्थात उनके लिए ऐसे व्यक्ति अच्छे साझेदार सिद्ध होंगे जिनका जन्म 8,17, और 26 तारीख को हुआ हो, मूलांक 8 वाले व्यक्ति को मूलांक 1 और 4 वाले व्यक्ति के साथ साझेदारी नहीं करनी चाहिए।
मूलांक 8 के लिए उपयुक्त व्यवसाय है : -
1. मशीनो्ं एवं लौह उपकरणों का निर्माण अथवा व्यापार का कार्य अथवा इस प्रकार के कार्यो मे संलग्र संस्थानों में नौकरी।
2. कोयला और लकड़ी से संबंधित व्यवसाय।
3. न्याय विभाग अथवा न्यायालयों में नौकरी, न्यायाधीश एवं वकील जैसे व्यवसाय तथा न्यायालय से संबधित अन्य कार्य।
4. पुलिस विभाग एवं जेल विभाग तथा अन्य सम्बद्ध विभागों में नौकरी अथवा इनसे सबंधित निजी कार्य।
5. लोहे की वस्तुएं, फर्नीचर, घड़ी, खेलकूद के समान, कृषि से संबंधित सामान आदि का उत्पादन एïवं व्यवसाय अथवा इनसे संबंधित संस्थानों में नौकरी।
6. स्थानीय स्वायत्त संस्थानों में नौकरी अथवा अन्य कोई पद निर्वाचन से प्राप्त करना.
7.खान विभाग, भूगर्भ विभाग आदि में नौकरी, खनिजों का व्यापार आदि।
8. खेलकूद एव शारीरिक परिश्रम (मजदूरी) से संबंधित कार्य।
9. ज्योतिष, धर्म, अध्यात्म एवं अन्य पराविद्याओं से संबंधित कार्य।
10. मुर्गी पालन, बागवानी जैसे कार्य।
11. विभिन्न प्रकार की ठेकेदारी।
12. विज्ञान, प्रयोगशाला, अनुसंधान एवं आविष्कार जैसे कार्य अथवा ऐसे कार्य करने वाले संस्थानों में नौकरी।
13.संगीत एवं शिक्षण सं संबंधित कार्य।
14. अस्थि रोग, दन्त रोग,उदर रोग, त्वचा रोग, श्वसन प्रणाली से संंबंधित रोग, नाक-कान गले के रोग, स्नायुतंत्र से संबंधित रोग आदि से संबंधित चिकित्सक अथवा इस प्रकार की चिकित्सा से संबंधित अन्य कार्य।
15. मैकेनिकल, माइन्स, सिविल इत्यादि विषयों मं इंजीनियरिंग अथवा निपुणता।
कीरो के अनुसार शनिवार, रविवार और सोमवार मूलांक 8 वाले व्यक्तियों के लिए अधिक शुभ वार होते हैं. इनके लिए शुभ तारीखें 8,17, और 26 है। इसके अतिरिक्त 4,13,22 और 31 तारीखें भी शुभ होती है. अंक 8वाले व्यक्तियों के लिए 4,8,13,17, 22, 26, 31, 35, 40, 44, 49, 53, 58, 62, 67, 71वें वर्ष शुभ होते हैं. यह एक साधारण नियम है. व्यावहारिक रूप से उनकी परीक्षा के उपरान्त ही कोई व्यक्ति अपने लिए शुभ वर्ष और दिन चुन सकता है. प्रत्येक व्यक्ति को अपने बीते जीवन के संबंध में यह विचार करना चाहिए कि उपर्युक्त में से कौन सा वर्ष और दिन उसके लिए अशुभ रहा है.उस वर्ष और दिन के मूलांक से संबंधित अन्य वर्ष और दिन भी उसके लिए शुभ नही माने जा सकते।
मूलांक 8 वाले व्यक्तियों के लिए 4 और 8 मूलांक वाले व्यक्तियों के साथ मित्रता करना शुभ रहता है।
मूलांक 8 का स्वामी ग्रह शनि है।अत: मूलांक 8 वाले व्यक्तियों को शनिदेव और हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए। नित्य शनि चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करना आपके लिए शुभ रहेगा।

चिन्ता एवं रोग निवारण के लिये मयूरेशस्तोत्रम

चिन्ता एवं रोग निवारण के लिये मयूरेशस्तोत्रम
ब्रम्होवाच
पुराणपुरुषं देवं नानाक्रीडाकरं मुदा।
मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं
नमाम्यहम्।।
परात्परं चिदानन्दं निर्विकारं हृदि
स्थितम्। गुणातीतं गुणमयं
मयूरेशं नमाम्यहम् ।।
सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं
निजेेच्छया। सर्व विघ्नहरं देवं
मयूरेशं नमाम्यहम्।।
नानादैत्यनिहन्तारं नानारूपाणि विभ्रतम्। नानायुधधरं भक्त्या मयूरेशं नमाम्यहम्।।
इन्द्रादिदेवतावृन्दैरमिष्टुतमहार्निशम्। सद्सद्वयक्तमव्यक्तं मयूरेशं नमाम्यहम्।।
सर्वशक्तिमयंदेवं सर्वरूपधर विभूम्। सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम्।।
पार्वतीनन्दन शम्भोरानन्द परिवर्धनम्। भक्तानन्दकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।।
मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम्। समाष्टिव्यष्टिरूपं त्वा मयूरेशं नमाम्यहम्।।
सर्वाज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम्। सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।।
अनेककोटिब्रम्हाण्डनायकं जगदीश्वरम्। अनन्तविभवं विष्णु मयूरेशं नमाम्यहम्।।
मयूरेश उवाच।
इदंब्रम्हकरं स्तोत्रं सर्वपापप्रनाशनम् सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम्।।
कारागृहगतानां च मोचनं दिनसप्तकात् । आधिव्याधिहरं चैव भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम्।।
अर्थ-ब्रम्हाजी बोले जो पुराणपुरुष हैं और प्रसन्नतापूर्वक नाना प्रकार की क्रीडाएं करते हैं जो माया के स्वामी हैं. तथा जिनका स्वरूप दुर्विभाव्य (अचिन्त्य) है उन मयूरेश गणेश को मंै प्रणाम करता हूं। जो परात्पर, चिदानन्दमय, निर्विकार संसार की सृष्टि,पालन और संहार करते हैं. उन सर्वविचन्हारा देवता मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूं. जो अनेकानेक दैत्यों के प्राणनाथ एक है.और नाना प्रकार के रूप धारण करते हैं. उन नाना अस्त्र शस्त्रधारी मयूरेश को मै भक्तिभाव से नमस्कार करता हूँ इन्द्र आदि देवताओं का समुदाय दिन रात जिनका स्तवन करता है तथा जो सत् असत्, व्यक्त और अव्यक्तरूप हैं उन मयूरेश को मै प्रणाम करता हूँ जो सर्वशक्तिमय, सर्वरूपधारी और सम्पूर्ण विद्याओं के प्रवक्ता हैं.उन भगवान मयूरेश को मैं प्रणाम करता हूं। जो पार्वतीजी को पुत्ररूप से आनन्द प्रदान करने और भगवान शंकर का भी आनन्द बढ़ाते हैं. उन भक्तानन्दवर्धन मयूरेश को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ । मुनि जिनका ध्यान करते मुनि जिनके गुण गीत गाते तथा जो मुनियों  की कामना पूर्ण करते हैं. उन समष्टि व्यष्टिरूप मयूरेश को मै प्रणाम करता हूं जो समस्त वस्तु विषयक अज्ञान के निवारक सम्पूर्ण ज्ञान के उद्वारक, पवित्र, सत्य ज्ञानस्वरूप तथा सत्यनामचारी है. उन मयूरेश को मै नमस्कार करता हूं जो अनेक कोटि ब्रम्हाण्ड के नायक जगदीश्वर, अनन्त वैभव सम्पन्न तथा सर्वव्यापी विष्णुरूप हैं. उन मयूरेश को मै प्रणाम करता हूं.
मयूरेश ने कहा यह स्तोत्र ब्रम्हभाव की प्राप्ति कराने वाला और समस्त पापों का नाशक है. मनुष्यों को सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तु देनेवाला तथा सारे उपद्रवों का शमन करनेवाला है. सात दिन इसका पाठ किया जाय तो कारागार में पडे हुए मनुष्यों को भी छुडा़ जाता है. यह शुभ स्तोत्र आदि (मानसिक चिन्ता) तथा व्याधि (शरीरगत रोगों को भी हर लेता है और भोग एवं मोक्ष प्रदान करता है.